संघर्ष
संघर्ष
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ज़मीन को उड़ते, आसमान तैरते देखा
जो कभी ना थमा, वो समा ठहरते देखा
जो गरज कर चुपचाप रहते थे हमेशा
उन बादलों को भी ज़ोर से बरसते देखा
कहते है हद से आगे कुछ नहीं
पर अपनी बार सब हदों को बढ़ते देखा
इस दर्द के सफर में मंजिलों को
नयी ऊंचाईयों पर चढ़ते देखा
फिर सोचा कि ऐसा क्यों देखा
जो मैंने देखा क्या तूने भी देखा
जवाब कुछ ना मिला जब किसी से
तो खुद को समझा लिया कि
ये फलसफा भी समझ जाऊँगा
और फिर कहूँगा सबसे
कि जो भी देखा, जब भी देखा
खुद को आजमाने को देखा
कभी मर्ज़ी से खुद की
कभी जाने-अनजाने देखा
पर बहुत कुछ सीखने के बहाने देखा
