समझ उग रही है
समझ उग रही है
प्रश्न थे
उनके उत्तरों की कोशिश थी
उलझन तो थी ही
क्योंकि उत्तर प्रश्न जैसे थे
और जीवन देख रहा था सब कुछ
जैसे आतंक से उसे मुक्क्त कराने की
सरकार की कोशिश
जैसे आतंक में शामिल सरकार
समय था समझ का
और समझ उग भी रही थी
कि ख़ौफ़ छा गया
महामारी का
डरने वाले भी ख़ौफ़ में हैं
और डराने वाले भी ख़ौफ़ में हैं
सब कुछ टँग गया है समय की
अरगनी पर
और समय गुजर रहा है
एक दिन ये ख़ौफ़ भी गुजर जायेगा
और जीवन शेष रह जायेगा जीवन सा
सरकार शेष रह जायेगी सरकार सी
प्रश्न शेष रह जाएंगे प्रश्न से
और उत्तर शेष रह जायेगा
जीवन सा
क्योंकि अकेले रहने का हुनर
सीख चुके होंगे
हम सब
और विचारों के डरावने परिवेश में
विचार हमारे अपने होंगे
कोरोना की तरह
विचारों से संक्रमित होने की
आदत शेष नहीं रहेगी
आदमी शेष रह जायेगा
और उसके साथ शेष रह जायेगी
उसकी आदमियत
जो कहीं खो गयी थी ख़ौफ़ में।
ये कोई विचार नही है
स्वभाव है
यूँ ही उगती है समझ
जो उग रही है
और उग रही है।
