सीख योगिराज की
सीख योगिराज की
निज संस्कृति तजें न,
न ही तजें निज संस्कार।
रख खुद पर अटूट भरोसा,
और प्रभु पर श्रद्धा अपार।
मर्यादा की सदा जरूरत है,
बीते कल और आज की।
ध्यान सीमा का भी जरूरी है,
न भूलें सीख कृष्ण योगिराज की।
जग में जरूरी होते ,
इस संसार के सब नाते।
विरासत में बहुत मिलते,
कुछ हैं आप और हम बनाते।
रिश्तों का मोल होता अनमोल,
इनकी मर्यादा होती है नाज़ की।
मर्यादा की सदा जरूरत है,
बीते कल और आज की।
ध्यान सीमा का भी जरूरी है,
न भूलें सीख कृष्ण योगिराज की।
अक्सर जीवन सफर सभी का ,
मुश्किलों से भरा ही है होता।
इसे आसां हैं बनाते रिश्ते,
है असह्य कष्ट कुछ से होता।
सीख दुनिया से लें,खुद करें फैसले,
जरूरत भी होती है हमको राज़ की।
मर्यादा की सदा जरूरत है,
बीते कल और आज की।
ध्यान सीमा का भी जरूरी है,
न भूलें सीख कृष्ण योगिराज की।
जग में हैं हम क्यों आए?
न निज लक्ष्य को हम भूलें।
वही निज पथ चुनें गमन हित,
सदा सुमन जिस पर धर्म के फूलें।
जग में अनुकरणीय तव कर्म हो,
सकल जग करे तव रिश्तों पर नाज़।
मर्यादा की सदा जरूरत है,
बीते कल और आज की।
ध्यान सीमा का भी जरूरी है,
न भूलें सीख कृष्ण योगिराज की।
