Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer
Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer

सच से मुकर गए तुम

सच से मुकर गए तुम

1 min
240


आईने से डर गए तुम,

सच से मुकर गए तुम।।


आम को पाने के चक्कर में,

बगीचे में ठहर गए तुम।।


गाँव की छोड़ कीमती जायदाद,

पैसे कमाने शहर गए तुम।


दरवाज़े पर रहती हैं एक परछाईं,

अभी तक नहीं घर गए तुम।।


खुद गए समंदर किनारे और,

लहरों को देख सिहर गए तुम।


चाँद बनने की चाहत में,

तारों सा बिखर गए तुम।



Rate this content
Log in