ऋत बसंत.. फागुन
ऋत बसंत.. फागुन
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बागों में नये फूलों के उपवन,
फागुन आयो.. लेके ऋत बसंत,
सर्द जवानी सी नटखट
धूप हल्की हल्की रवानी की मूरत,
साथ दोनों का जैसे.. आहलादक,
मूरत जैसे हो संगेमरमर,
प्रीत दोनों की परवान चढ़े
जब खिले बाग बाग ऋत बसंत
न राज ए दिल ऋतुओं का
समझ में आये
बिना एक ना बसंत फागुन लाये।
