रिश्तो की पोटली
रिश्तो की पोटली
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वासुदेव कुटुंबकम की जगह
हम दो हमारे दो में परिवार समाने लगे
अब अपनों की वह प्यार वाली थपकी भुलाने लगे
व्हाट्सएप फेसबुक में सब दिल लगाने लगे
मोबाइल पर ही दिन बिताने लगे
वक्त की दुहाई देकर अपनों से दूर जाने लगे
खुदगर्ज बनकर चेहरों से नकाब उठाने लगे
अब हर मन की दीवारें लगने लगी है खोखली
संभाले भी नहीं संभलती है आजकल
रिश्तो की पोटली।
