पतझड़
पतझड़
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पतझड़ था,
पत्तियां झड़ गयीं थीं
शाखों पर सिर्फ कांटे थे
टेढ़े,मेढ़े नुकीले नुकीले।
लोग अनायास बेचैन थे उदास थे
ये बेचैनी और ये उदासी
उससे देखी न गयी
कितनी मशक्कत से उसने पतझड़ के
दोनों सिरों का पकड़ा और निचोड़ दिया
ये जो बसन्त आया है,
वो खुश खुश कविताएँ लिखता है
इसे मौसम का उपहार बताता है
उसी पतझड़ का निचोड़ है।
अब किसी को क्या पता
कितनी मशक्कत होती है
पतझड़ के दोनों सिरों को पकड़ने में
पकड़कर उसे निचोड़ने में।
अब जब पतझड़ आये न
उदास न होना,बेचैन मत होना
इसी बसन्त को ओढ़ लेना
पतझड़ का पतझड़
बसन्त का बसन्त।
