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Zahiruddin Sahil

Others

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Zahiruddin Sahil

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परछाइयां

परछाइयां

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ज़िन्दगी रेत की

मानिंद

सांसों की

मुठ्ठी से फिसलती है।


अतीत से परे

भी

अतीत की

परछाइयां

उभरती हैं।।


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