Zahiruddin Sahil
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ज़िन्दगी रेत की
मानिंद
सांसों की
मुठ्ठी से फिसलती है।
अतीत से परे
भी
अतीत की
परछाइयां
उभरती हैं।।
सुबह
रंग ए वतन
भेज भइया को ब...
आशियाना
अमल
इशारों क...
बुलावा
पैगाम
आँगन
होने से