पंद्रह छोटी कविताएँ
पंद्रह छोटी कविताएँ
इतिहास
मनुष्य का इतिहास
दरबारियों, अवसरवादियों और चाटुकारों
द्वारा नहीं लिखा गया
गरीबी, जहालत और विवशता से
उपजा लावा
बहा है
और फ़ैल गया है
समय समय पर
इतिहास के पृष्ठों पर.
विक्ट्री
अपने ही नासूर को चाटता
खाज भरे कुत्ते सा जनतंत्र
लहूलुहान हो हाँफ रहा है।
अन्तिम साँस लेने की प्रक्रिया में
कोई उसकी पूँछ में पटाखों की
लड़ें बांध, आग लगा देता है।
वह ध्वनि की गति से भागता है
बेतहाशा
और दौड़ में विजयी होकर
विक्ट्री स्टेंड पर
श्लथ सा पड़ा
हाँफ रहा हैं।
सामूहिक नपुंसकता
सैकड़ों सिर और हाथ
आकाश की ओर उठे हुए
किसी युग पुरुष के
अवतरण की प्रतीक्षा में
कई युग बीता चुके हैं.
संकल्प
हताश तो होते रहे हम
टूटते भी रहे हम
लेकिन, सिर नहीं पटका हमने
बेदर्द पत्थरों के सामने.
महत्वाकांक्षा
स्वर्गारोहण की / महत्वाकांक्षा
त्रिशंकु –सी लटकी पड़ी है/ उल्टी
आकाश में
आदिकाल से
पकड़
चिड़िया
फुदकी और
पेड़ पर बैठ गई
आंधी आई
पेड़ हिलता रहा
चिड़िया की पकड़
मजबूत होती गई
धूप
पहाड़ों की गहन हरियाली से
छनती धूप
घाटी में बामुश्किल पहुँचती है
गोल दायरे में बंधकर
लोग लपक कर /धूप के ताप को
लबादों में जकड़ने का/ प्रयास करते हैं .
परेशानी
लपलपाती लू
सूखी जमीन की धूल, बालू और तिनके
उठा ले गई आकाश में
आकाश में उठा एक चक्रवात
बर्फ से सफ़ेद बादल पर बैठ गई है धूल
चाँद परेशान है, मटियारी चांदनी को देखकर
चांदनी से कहो, वर्षा को बुलाकर नहा ले.
निराशा
यहाँ पंछी की फड़फड़ाहट नहीं
यहाँ तो सिर्फ सन्नाटा है
उबलते मस्तिष्क....कुछ नहीं
हांफते दिल की धौंकनी ....कुछ नहीं
सिर्फ मौत की इंतजार का सन्नाटा है .
एहसास
चढ़ाईयां चढ़ते
ऊँचे आकाश को चूमते,
देवदार और चीड़ के दरख़्त
मेरे अहम को तराश देते हैं
उतराईयां उतरते,
गहराइयों से घूरती ऑंखें,
मेरे गुरु गम्भीर मन को
छिछला तालाब बना देती है.
परिवेश
धुआँ उठता है, घाटियों में
और वहीं ठहर जाता है
पहाड़ियों की ऊँचाइयों को
छू नहीं पाता
ठहरे धुएँ की
घुटन सहता
ठंडी आर्द्र घाटियों का
परिवेश.
धूप-छाँव
तेरे हिस्से की धूप
और/तेरे हिस्से की छाँव
पर उसने अपना कब्जा जमाकर
तुझे विस्थापित कर दिया है
कुछ तो कर कि
तेरे हिस्से की धूप-छाँव तुझे मिल सके .
आवाज
पहाड़ों की पगडंडियों से
गुजरते वक्त, जो आवाज
तुमने दी थी
एक अकेली आवाज
नैसर्गिक उन्मुक्त आवाज
आवाज की प्रतिध्वनियाँ
घाटी की गहराइयों से उठती हुई
दिल में उतर जाती है
और करती हैं, हॉन्ट
लगातार.
निशाना
कांच की रंगीन
पारदर्शी गोलियों से
खेलते हैं हम /सीखते हैं
एकाग्र हो, साँस थाम
निशाना लगाना
टकराती है गोलियाँ
रंग बिखरकर दौड़ पड़ते हैं
हम किलकारी मार
तालियाँ बजाते हैं.
तब कोई अधेड़ सा व्यक्ति
चिल्लाता है- कुछ, पढ़ो-लिखो
लेकिन हमें अफ़सोस है
वहाँ कोई निशाना उभरकर नहीं आता
साधना तो दूर की बात है.
योजना
निराशा और आदर्शवाद की
दो अन्तिमताओं के बीच
पेन्डुलम सा झूलते रहना
उदासीनता और आक्रोश की तीव्रता से तो अच्छा है,
ठंडे दिमाग से
दीमकों के उन्मूलन की
योजना बनाएँ
जो हमारे अन्दर घुसकर
हमें, कर चुकी हैं / खोखला.
