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मानव सिंह राणा 'सुओम'

Others

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मानव सिंह राणा 'सुओम'

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पिताजी

पिताजी

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घर पर बन गए भार पिताजी

सहते सबकी दुत्कार पिताजी


खुद भूखा रह कर बच्चे पाले

बनकर इज्जतदार पिताजी

बच्चों से दाना पानी पाकर

जता रहे आभार पिताजी


हृदय की हर अभिलाषा कर दी 

बच्चों के लिए तैयार पिताजी

सभी बहुत हँसी खुशी रहते थे

लगते थे दिलदार पिताजी


उनकी खुशी कौन पूछे अब

अब तो हैं बस रार पिताजी

रात रात भर जगते रहते 

हो गए चौकीदार पिताजी


मांगने खड़े थे जब सब भाई

तब तो थे अधिकार पिताजी

अब मांग रहे चश्मे को पैसा

व्यवहार के हैं बेकार पिताजी


अपने हाथों से कौर खिलाते

धर्म का थे अवतार पिताजी

एक कोने में अब रोते रहते 

लगते हैं अब भार पिताजी


एक दिवस के राजा देखो

अब भी हैं माहवार पिताजी

पेंशन देकर हो जाते हैं 

गाली खाने को तैयार पिताजी


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