मतलबी
मतलबी
देखने में अक्सर दिखती है भली दूनिया,
कहाँ सगी होती है सभी की दूनिया।
काम हो तो कईबाऱ पूछेंगे,
काम निकलते ही बन जाती है मतलबी दूनिया।
कामयाबी किसी की देखकर प्रशंसा करना
तो दूर, ढूंढती है क्या कमी रह गई यह मतलबी दूनिया।
बात अकड़ कर करेगी अपनों से हर पल,
बात सीधी को भी उलट कर देती है नहीं सगी किसी की दूनिया।
देख कर हर किसी की बदसलूकी समझ नहीं आता
क्यों फरेबों से भरी है दूनिया।
किस को सुनाये अपने दिल की बात कोई,
अपनों से भी जलती है अपनों की दूनिया।
एक साथ पाल पोस कर करती हैं जिनको बड़ा,
नहीं बनती उस माँ बाप की सगी यह दूनिया।
यही सोच टकराती है अक्सर दिल में सुदर्शन,
सीख बचपन की क्यों भूल जाती है यह अजब गजब की दूनिया।
पता सभी को है कि अन्त एक जैसा है सभी का सुदर्शन,
फिर क्यों अलग थलग पड़ी है यह दूनिया।
