मजहब
मजहब
अश्कों की अज़िबोगरीब दास्ताँ
यह जिंदगी मुकम्मल बेजुबां है
उल्फ़त का यह है जनाजा
बेवफ़ाई ही इसका इन्तिहा है
शिद्दतों का असर यक़िनन
फ़रिश्ते गर चे हमपर मेहरबां है
खुदगर्ज- जाहील इन्सान पे
होती नहीं कुदरत मेहरबां है
शातिर मिज़ाज का मालिक
दोज़ख में भी जगह न है पाता
ख़न्जर किया पार कलेजे के
मज़हब का नाम है जब आता
गरीबों का हक-हकूक़ खा-पचा,
अमीरजादा बन वह बड़ा कहलाता
सिकन्दर से अकबर की सफ़र
वह तय कभी भी नहीं कर है पाता
सितारों की बात वह करता
अपनी धरती को तो नाप नहीं पाता
हज-तीर्थ-किताबों के पन्नों में,
मालिक को मंदिर में वह बिठाता
खुद की नब्ज़-दिमाग़ का
मुआयना नहीं वह कर पाता
कवि शायर बन कर अदना
सहज नेह में रम उसे पा जाता
जिंदगी ओर मौत का असर
बंदों पर कभी हो नहीं पाता।
जिंदगी जीना सीख मोहन,
गिरतों का हाथ थामता तो जन्नत पाता
