महकता ग़म रहा ...
महकता ग़म रहा ...
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सिलसिला तेरा सनम हरदम रहा
तू रहा मुझमें या तेरा ग़म रहा
आपकी फ़ुर्कत में ये आलम रहा
पतझड़ों जैसा हरिक मौसम रहा
ऐसी लज्जत इंतिज़ारी में मिली
उनके आने का वहम फिर कम रहा
क्या निकल आए लहू भी आँख से
अश्क़ तो बनने से अब शबनम रहा
फिर बहारों का भला मतलब ही क्या
ख़ौफ़ कलियों पे अगर क़ायम रहा
लुत्फ़ आता ही रहा जीने में यूँ
दर्द जितना भी रहा मद्धम रहा
और तो कुछ मिल सका न यार पर
दूर तक मुझमें महकता ग़म रहा।
