STORYMIRROR

शालिनी मोहन

Others

2  

शालिनी मोहन

Others

मेरी सारी नज़्में

मेरी सारी नज़्में

1 min
177


बादल उभरे उभरे थे

बिजली भी कुछ ख़ामोश थी

उस दिन 

बहती नदी के किनारे पर

एक लंबी धूप की चादर में

तुमने मेरी सारी नज़्में

छान छान के रख ली


अब मछलियाँ नहीं

आती किनारे

क्यों चुराई तुमने

मेरी सारी नज़्में


Rate this content
Log in