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संजय असवाल "नूतन"

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संजय असवाल "नूतन"

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मेरा मन

मेरा मन

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चंचल हिरनी सा मन मेरा

पल में खिलता पल में घबराया सा,

सुख में सुकमाया सा,

दुःख में दुःख से बेकल,

कभी वह श्रंगार के फूलों सा

कभी वह सहज कुम्हलाया सा,

फूला ना समाता खुश होकर

कभी घर भर देता रो रो कर,

कभी वो कहता ये जग मेरा

कभी वो कहता क्यूं रखूं नाता,

मेरे मन की ये दुर्बलता

निज बदले क्षण क्षण भर,

बार बार जब भी समझाता

मन मेरा समझ ना पाता,

जीवन क्षणिक है

जी लो खुलकर,

धूल हो जायेगा

मिट्टी में मिल कर।


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