मधुर मिलन
मधुर मिलन
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नई उषा का रूप खिला है
आज धरा के आंगन में।
बसंत ने फिर छटा बिखेरी
छाई बहार हरबाग उपवन में।
यह क्या बोले मुरली के स्वर
बुलबुल चहकी मस्त पवन में।
हुई धरा फिर शीतल जग में
दिया नवजीवन बसंत ने।
सतरंगी खिल उठे फूल चमन में
लगी तितलियां मंडराने।
भंवरे झूम झूम कर आए
फूलों का रस पीने।
लग रहा है यू धरा श्रृंगार किये
पीली सरसों की चुनर ओढ़ के।
मधुर मिलन की आस संजोकर
मिलेंगे चंद्र धरा फिर झूम के।
