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Nivish kumar Singh

Others

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Nivish kumar Singh

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माँ

माँ

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जन्म से जीवन तक रहता जिनका साथ

वो है अपनी प्यारी “माँ”

रेंगते हुए से खड़ा किया, 

माँ कि उंगली पकड़े 

न जाने कब मैं बड़ा हुआ। 


अपने आँचल में धूप को समेट

शीतल छाँव में रख मुझे बचाया। 

मेला के खत्म हो जाने पर

पिरहा के झूला बना झुलाया। 

खरीद न सकी असली हाथी तो क्या, 

माटी के हाथी खरीद,

मुझे धरती का राजा बनाया। 

सूख जाते होंठ या रूठ जाता मन

माँ के एक चुंबन से 

ठीक हो जाता सब। 


बाहर के बुरी नजरों से

काले टिके से बचाया। 

सुबह का अपना मीठी नींद भुला

उठकर सबसे पहले नाश्ता बनाया। 

खुद खाए भले दोपहर में, 

लेकिन तबतक अपने बच्चों को 

तीन बार खिलाती। 


जो ज्ञान मिला न स्कूलों में

माँ कि ममता ने उसे सिखलाया

गुरु है भगवान

यह बताकर स्कूल भेजवाया। 

कभी न भूलना छूना गुरु के पैर, 

डाँट डाँट मेरे अंदर, ये अच्छे आदत बसाया। 


जिनके होती नहीं माँ

उनसे माँ के एक चुंबन कि कीमत पूछो, 

परेशान होता है जब उनका मन

तब आँचल में जगह पाने कि दर्द को पूछो, 

होते है जब वो बीमार

पास माँ न होने का गम उनसे पूछो। 


आज नादान बच्चा जवान हुआ

माँ भी अब बूढ़ी हुई

पर माँ की ममता में

अब तक न कमी आई। 

नादान बच्चा तुझसे कोई चूक न हो, 

तेरी माँ को बुढ़ापा में कोई दुःख न हो। 



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