माँ
माँ
दुनिया में पहली आश्रय प्रदान करने वाली।
नौ महीने तक अपने रक्त से हमें पोषित करनेवाली।
वो माँ ही तो है ! ममत्व की मूरत !
हाँ वही माँ ! जो हमें गर्भ में भी
लोरियाँ सुनाकर सुलाती है !
सावधानीपूर्वक हमारा ख्याल रखती है।
हमारी जरूरतों को
एक आहट से ही जान लेती है !
पहचान लेती है !
और समझकर हमें
सुकून भरी हामी भरती है।
हाँ ! वही माँ ही तो है।
ममता की मूर्ति।
फिर जब हम नई मतलब की दुनिया में
कदम रखते हैं !
न किसी से कोई परिचय
न किसी चीज का भान
ज्ञान।सिवाय उसके कौन
हमारा परिचित साथी होता है !
वो माँ ही तो है जो हमें दुनिया समझाती है !
दुनिया की रीत सिखलाती है।
पुरानी दुनिया की तरह इस दुनिया में भी
एक वही तो है अपना सच्च हितैषी।
हमें इस धरा पर भी अपनी लहू से
हमारी क्षुधा शांत करती है।
हमें अमृत्तव प्रदान करती है।
खुद भूखी रहकर भी
हमारा भरण पोषण करती है।
और कौन हो सकता है ऐसा स्वार्थी
जो दूसरों का हित चाहती हो ?
हाँ वो केवल एक माँ ही तो है।
