माँ-पापा
माँ-पापा
तुम्हारी हर जीत पर माॅं-पापा इतराए थे।
तुम्हारी खुशियों की खातिर कितने सपने सजाए थे।
उन्हें इंतज़ार था तुम्हारी हर उस जीत में मिठाई बांटने का,
जिस जीत में तुम मेहनत कर के मुस्कुराए थे।
खुश होकर तुम्हारी कामयाबी के किस्से सबको सुनाए थे।
तुम्हारी मेहनत के पीछे उनकी भी मेहनत रही होगी।
कभी रातों को जाग कर कभी सुबह जल्दी भाग कर ।
मुस्कुराते हुए तुम्हारी किसी नाकामी पर गले से लगाया होगा।
आगे सब अच्छा होगा कह कर हर ड़र भगाया होगा।
आज भी तुम्हारी कामयाबी पर उनके अधर मुस्कुराते हैं।
जब वो ना होंगे तो कौन तुम्हारी कामयाबी पर मुस्कराएगा।
निस्वार्थ हो कौन तुमको गले से लगाएगा।
तुम्हारी खुशियों में वो दिल से मुस्कुराते हैं।
तुम्हें जरा सा ग़म आए तो वो टूट जाते हैं।
दुआएँ देते हैं दिल से तुम्हें पता भी नहीं चलता।
दुआओं की एक पोटली चुपके से तुम्हारे सिर में छोड़ जाते हैं।
केवल पैदा करने से ही नहीं एक तप करके माँ-बाप, मम्मी-पापा कहलाते हैं।
______✍️गीता कुमारी
