"माँ का प्रेम"
"माँ का प्रेम"
माँ बच्चों के प्रेम में बैठी है ।
सुबह से हो जाती है शाम।
माँ करती प्रेम अपने बच्चों से
मानो आँखों से पीना चाहती ।
दया ,करुणा से निहारती माँ ।
सब बच्चों को शांति देता
माँ का निश्छल प्रेम ।
सत्यवादी बनाता प्रेम ,
कोमल स्वभाव सिखाता
सबका आदर करवाता
माँ का निश्छल प्रेम ।
पवित्र विचारों वाला बनाता ।
माँ का निश्छल प्रेम ।
माँ समझाती है जैसे
उत्तम खान से निकली
चमकदार महामणि श्रेष्ठ
मानी जाती है ऐसे ही
जिसके पास प्रेम रूपी
महामणि है वह अन्नत
तेजवाला प्रसन्न चित रहता
हमेशा शुद्ध उसका हृदय
होता।
वह अपने तेज से हमेशा
सूरज की तरह चमकता है।
प्रेम करने वाला सबके
दिलों को जीत लेता है ।
