Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer
Become a PUBLISHED AUTHOR at just 1999/- INR!! Limited Period Offer

माँ बाप

माँ बाप

1 min
328


बंटे माँ बाप भी अब तो

यहाँ दिन और महीने में

कभी जो एक ही आँचल में

माँ सबको सुलाती थी


सुबह और शाम की भी

बंट गयी है रोटियाँ अब तो

कभी जो रह के खुद भूखे

माँ बच्चों को खिलाती थी


तड़प उठती थी माँ बच्चों को

गर तकलीफ होता था

हमारे वास्ते खुशियों के

सब दर्द सह जाती थी


कई रातें वो जागे जैसे हो

बातें कुछ लम्हो की

छुपाके खुद के दर्द को

हमे हँसना सिखाती थी


कभी सोचा नहीं क्या

ख़्वाहिशें मेरी भी अपनी है

हमेशा वास्ते बच्चों के

वो सपने सजाती थी

फटी साड़ी फ़टे जुते

नहीं माँ बाप ने बदले

हमारे वास्ते पढ़ने को


माँ सामान लाती थी

नहीं देखी कभी गर्मी

कभी सर्दी और बारिश को

हमारे सर पे रख आँचल

माँ खुद ही भीग जाती थी


है जागे रात भर सोचे

नहीं जो नींद क्या होती

माँ खुद गीले में सो करके

हमे सूखे में सुलाती थी


करे कुर्बान जो बच्चों पे माँ

यूँ हँस करके जीवन को

माँ रोती थी मगर फिर

भी दुआए देती जाती थी


सलामत गर रहे आँचल जो

माँ का खुशियाँ ही खुशियाँ है

शिवम् हँस करके माँ

अपनी सभी दर्द छुपाती थी !! 

 

 



Rate this content
Log in