लहरों से टकराना है
लहरों से टकराना है
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ज़िंदगी की नाँव को संसार रूपी सागर में बहाना है
चाहे आके आँधी या लाख तूफ़ाँ उसे आगे बढ़ाना है
संग लेकर विश्वास की पतवार नाँव को चलाना है
बीच सफ़र में उठती गिरती हर लहरों से टकराना है
मिले दुःख की गहराई तो ख़ुशी से पार कर जाना है
मझधार में थके नाँव तो सफ़र के क़ाबिल बनाना है
हालात से विपरीत चलती हवा से अनुकूल बन जाना है
साहस और मजबूत इरादे से साहिल तक पार लगाना है।
