कविता कारवां
कविता कारवां
1 min
222
दिल की गलियों से निकला
जब यादों का कारवां
ठहरा कर अश्क
पलकों पर
किया इसका सामना
दिल में उठे जज्बात
जब जुबां न कह सकी
नजरों की मुंडेर से
किया इसका सामना
अधूरी हसरतों का
जब देखा जनाजा
सीने को थाम कर
किया इसका सामना
खुशनुमा कुछ गुमनुमा पल
जब समेटे बढ़ रहा था कारवां
अनजान गली कूचों ने
किया इसका सामना।
