खिलौना...
खिलौना...
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गुड्डा- गुड्डी, रोना- धोना,
ये बचपन का जादू टोना।
भूल गयी जी नूतन पीढ़ी ,
मोबाइल बस खेल खिलौना।
प्यार बढ़ा परवान चढ़ा है,
तन- मन लगता सोना- सोना।
लड़का- लड़की खेल रहे है,
इक- दूजे को समझ खिलौना।
चाह जिसे बस दौलत की है,
ऊँचा फिर भी लगता बोना।
उसके हाथों की कठपुतली,
समझ रहा वो महज खिलौना।
मुंह में राम बगल में छुरी,
बंद करो ये काम घिनौना।
साँसें किसकी कब थम जाएं,
ये दिल भी है एक खिलौना।
