STORYMIRROR

S Ram Verma

Others

2  

S Ram Verma

Others

ख़ामोशी

ख़ामोशी

1 min
185

ख़ामोशी को खामोश समझना

भूल ही होती है अक्सर,


कितनी हलचल और अनगिनत 

ज्वार भाटे समाए होते है इसमें अक्सर,

 

आँखों में समाई नमी जाने कितने 

समंदर छुपाये होती हैं अपने अंदर अक्सर,


नहीं टूटते ऐसे मन के ज्वार -भाटे

जब तक कोई कंधे को छू कर ना आंके अक्सर


कि मैं तुम्हारे साथ हूँ हर पल

हर परिस्थिति में समझे तुम !



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन