खामोशी
खामोशी
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देखो अगर पसंद न हो मेरी मौजूदगी
तो सीधे सीधे कहना
मगर,
खामोश मत रहना।
क्योंकि ये खामोशी मेरी आत्मा पर
भीतर तक प्रहार करती है।
मेरे रोम का हर एक हिस्सा
मुझे कचोटता है
और
चीख चीख कर कहता है
कि
कुसूर मेरा ही होगा।
तुम्हारी ये खामोशी
मेरे मानस पटल पर
एक गहरा प्रहार करती है,
मेरा मन उद्विग्न हो उठता है
और
मेरी आंखों से समंदर का बांध टूट पड़ता है।
मेरे जज्बातों का कोई अर्थ नहीं रह जाता
और
मेरे जीवन में फिर छा जाती है
खामोशी.............।
