बचपन
बचपन
1 min
23
कोई लौटाए नहीं मग़र,
बचपन वापस लाना है,
फ़िर परियों और जादू की कहानी
में,
पढ़कर खो जाना है।
कभी उदासी में
माँ की गोदी से
लिपटकर,
बेफ़िक्र
रोना- चिल्लाना है।
कभी खुशी में
भाई -दोस्तों संग,
मुस्कुराना-ठहाका लगाना है।
कभी
पापा संग घंटों बैठकर,
बतियाना-गुनगुनाना है,
कभी-कभी
मस्खरी कर,
उन्हें
पीछे- पीछे दौड़ाना है।
कुछ पल
जिंदगी की
उलझनों से दूर,
उस बचपन संग बीताना हैं,
जहां
सपनों की दुनिया
जीने का,
सारा ताना- बाना है।
कोई लौटाए नहीं
मग़र,
वो बचपन वापस लाना है।
