बचपन
बचपन
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कोई लौटाए नहीं मग़र,
बचपन वापस लाना है,
फ़िर परियों और जादू की कहानी
में,
पढ़कर खो जाना है।
कभी उदासी में
माँ की गोदी से
लिपटकर,
बेफ़िक्र
रोना- चिल्लाना है।
कभी खुशी में
भाई -दोस्तों संग,
मुस्कुराना-ठहाका लगाना है।
कभी
पापा संग घंटों बैठकर,
बतियाना-गुनगुनाना है,
कभी-कभी
मस्खरी कर,
उन्हें
पीछे- पीछे दौड़ाना है।
कुछ पल
जिंदगी की
उलझनों से दूर,
उस बचपन संग बीताना हैं,
जहां
सपनों की दुनिया
जीने का,
सारा ताना- बाना है।
कोई लौटाए नहीं
मग़र,
वो बचपन वापस लाना है।
