कातिल हवा
कातिल हवा
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सहमा सहमा डरा डरा साँस ले रहा है हर शहर
लगता है बेनाम राहों से गुजर रहा बनके कोई कहर।
बंद हो गयी जिन्दगी जंजीरों से कसी तालों में
सन्नाटा है पसरा बस कुछ निरीह जानें ठहर गयी राहों में।
उन टूटे छप्पर पर नही कोई दरवाजे
लगा पेट में ताला,पड़े अलग-थलग से सारे।
गुजर जाएगी यह कातिल हवा,ताले भी खुल जाएँगे
जंजीरें टूट जाएँ चाहे सारी पर अब हद में
जिन्दगी जीना हम सीख जाएंगे ।
