कासे कहूँ
कासे कहूँ
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कासे कहूँ सखी
दिल की चोट
कभी गम
कभी उलझन
आँख हो गयी
पुरनम
अनजानी कभी
पहचानी कभी
आवाज कहीं
छुअन कोई
गयी भीग
रात कभी
रही रोती
शबनम कहीं
इंतजार कहीं
वादा कोई
अपना कभी
सपना कहीं
सो गई
नींद कभी
चौक के
जाग गयी
सपना कभी
सुन सखी
पीर मेरी।
