STORYMIRROR

इंदर भोले नाथ

Others

2  

इंदर भोले नाथ

Others

जमीं पे उतारा था

जमीं पे उतारा था

1 min
380

कागज़ की कश्ती बना के समंदर में उतारा था

हमने भी कभी ज़िंदगी बादशाहों सा गुजारा था,


बर्तन में पानी रख के, बैठ घंटों उसे निहारा था

फ़लक के चाँद को जब, जमीं पे उतारा था,


न तेरा था न मेरा था हर चीज़ पे हक हमारा था

मासूम सा दिल जब कोरे कागज़ सा हमारा था,


बेपनाह सी उमंगें थी, कई मंज़िल कई किनारा था

अब तन्हा जी रहे हैं हम तब महफ़िलों का सहारा था


Rate this content
Log in