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इंदर भोले नाथ

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इंदर भोले नाथ

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सारी रात मैं सुलगता रहा,

वो मेरे साथ जलता रहा

मैं सुलग-सुलग के 

घुटता रहा, वो जल-जल

के, ऐश-ट्रे में गिरता रहा,

गमों से तड़प के मैं

हर बार सुलगता रहा

न जाने वो किस ग़म

में हर बार जलता रहा


मैं अपनी सुलगन को

उसकी धुएँ में उछालता

रहा, वो हर बार अपनी

जलन को ऐश-ट्रे

में डालता रहा,

घंटों तलक ये सिलसिला

बस यूँ ही चलता रहा

मैं हर बार सुलगता

वो हर बार जलता रहा

मेरी सुलगन और उसकी

जलन से ऐश-ट्रे

भरता रहा, भरता रहा...!!



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