STORYMIRROR

Shivanand Chaubey

Others

3  

Shivanand Chaubey

Others

इंसान

इंसान

1 min
298


इंसान की गली में इंसान बिक रहा है

जिस्म बिक रहा है और जान बिक रहा है


दुश्वारियों की बंदिशों में हो गया जमाना है

नफरतों की गलियों में अब तो आना जाना है

वफा की राहों में दुश्वारियाँ भी कुछ कम ना

जहाँ मान बिक रहा है सम्मान बिक रहा है


है प्यार भी ये झूठा इज़हार भी ये झूठा

करते जो सब है सेवा सत्कार भी ये झूठा

है स्वार्थी की महफ़िल सब नफरतों कि

गलियों में

जहाँ बिक रही जमी है आसमान बिक रहा है


नफरत कि आती बू है अब इन हवाओं में भी

कुछ शक सा हो रहा है तेरी फिजाओं में भी

कुछ भी न कहो मुझसे सब यार जानता हूँ

जहाँ मौत का सब साजो सामान बिक रहा है  


क्या खूब है सजाया इंसान की महफ़िल को

महफ़िल में उसी देखो अरमान बिक रहा है

ईमान कि महफ़िल में शिवम ना कोई दुश्वारी हो

बुत के शहर में देखो भगवान बिक रहा है

है स्वर्ग सा सरीखा ये अब जहान बिक रहा है !!

 

 

 



विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन