इल्ज़ाम ।
इल्ज़ाम ।
1 min
437
कभी तोहमतें किरदार पर थीं
तो कभी शिकवे आम थे हमसे
कभी रुसवाईयां सरे बज़्म थी हमसे
तो कभी बेफाइयां हमसे
कभी ऐबों से दिए कितने ही दाग़ दामन को
तो कभी इस क़दर थे गिले हमसे
कभी रोने पर भी पाबंदियां थी
तो कभी मुस्कुराने पर भी थे एतराज़ हमसे
कभी फ़िज़ूल में ख़फ़ा थी ये ज़ात-ए-इन्सानियत
तो कभी यूँ ही रूठ गई बे मतलब हमसे
कभी अपना कहकर गले से लगाया हमें
तो कभी बे हयाई से रुख मोड़ लिया हमसे ।
