गज़ल
गज़ल
खास की है आम की भी है गज़ल ।
तीरगी में रोशनी - सी है गज़ल ।।
मुस्कराहट हर किसी को बाँटकर,
दर्द का हर घूँट पीती है गज़ल ।
खास दौलतमन्द की है तो कभी,
भूख की है तिश्नगी की है गज़ल ।
कोठियों में कहकशों की शाम बन,
बन्द बोतल में मचलती है गज़ल ।
ग़मज़दा हर झोपड़ी की रात तो,
दर्द में लिपटी कहानी है गज़ल ।
हौसला है जंग के मैदान में,
जुल्म हो तो क्रांतिकारी है गज़ल ।
मस्जिदों में है अजानों की ये धुन,
मन्दिरों में आरती करती गज़ल ।
एक साधक के लिए है साधना,
आस्था की ये निशानी है गज़ल ।
एक होकर :भी अनेकों रूप हैं,
दीप भी है और बाती है गज़ल ।
नफरतों का हर अँधेरा चीरकर,
प्यार का सूरज उगाती है गज़ल ।
सूर मीरा तो कभी रसखान है,
मीर ग़ालिब और तुलसी है गज़ल ।
