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Kusum Lakhera

Others

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Kusum Lakhera

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गिल्लू गिलहरी !!

गिल्लू गिलहरी !!

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वह धारीदार गिलहरी बहुत थी प्यारी 

उसके शरीर पर थी सुनहरी धारी

वह आई थी मेरे पास ..

.जब मैं उस दिन थी बहुत उदास ...

न जाने उसे मैं क्यों भायी ...

वह मेरे बहुत पास थी आई ..

मेरे चेहरे की उदास रेखाओं को मानो 

उसने पढ़ लिया था ...

मेरे भीतर के दर्द को न जाने कैसे गढ़ लिया था !

अक़्सर जब भी अनाथालय में किसी भी बच्चे से

होती थी मेरी लड़ाई ...

या होती थी मेरी वार्डन से पिटाई ...

तब मैं पार्क में चुपचाप आ जाती थी ..

आंसुओं से आँखे भीग जाती थी ...

अक्सर जब भी पार्क में आती थी ..

वह गिल्लू गिलहरी भी मेरे आगे पीछे इठलाती थी !

उसे मेरी ...और मुझे उसकी दोस्ती बहुत भाती थी !

वह मेरी गोद में बैठती , कभी इधर दौड़ती ..

कभी उधर दौड़ती ..कभी कहीं दूर भाग जाती थी !

मैं उसके साथ खेलकर अपना सारा गुस्सा ,

सारा गम सब कुछ मानो भुला जाती थी ...

पर एक दिन वह गिल्लू गिलहरी नज़र न आई 

मुझे उसकी चिंता बहुत सताई ...

तभी मैंने देखा गिल्लू के हाथ में कुछ चमकता काँच 

सा था ...

मैंने गिल्लू के हाथ बढ़ाया तो ...गिल्लू ने जो मुझे दिया

उसे देखकर मेरा मुहँ खुला का खुला रह गया ..

तभी वहाँ एक बहुत अमीर सी दिखने वाली बुढ़िया 

आई ..वह तेज से बोल रही थी किसी को कोई हीरा 

तो नहीं मिला ...वह अपनी अगूंठी को दिखा कर बोली

इससे शायद कहीं है ....गिरा ...

तब मैंने उस वृद्धा से कहा ...अम्मा शायद ये तो नहीं !

वृद्धा चिल्लाई ...अरे ये तो है वही ...

पर तुम्हें कैसे मिला ?

मैंने अपने हाथ मे गिल्लू को दिखाते हुए कहा ..

ये तो इस प्यारी गिलहरी को मिला !

तब वृद्धा ने कहा ...तुम दोनों को मैं अब अपने साथ 

ले जाऊँगी ..

और इस अनाथालय से तुम्हें मुक्त करके

 खूब पढ़ाऊंगी ..

इस तरह से मेरी क़िस्मत को उस दिन से गिल्लू ने बदल दिया !!



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