STORYMIRROR

Kamal Purohit

Others

2  

Kamal Purohit

Others

ग़ज़ल

ग़ज़ल

1 min
167

ज़िंदगी फिर से आजमाने लगे

खुद को ही गले लगाने लगे


घोंट कर वो मेरा गला देखो

तोहमत मुझपे ही लगाने लगे


कल मुहब्बत की कसमें खाते थे

आज अपनों को ही रुलाने लगे


दुश्मनों ने लिया न बदला पर

दोस्त खंजर छूरी चलाने लगे


ख़्वाहिशों की किये हैं खुद हत्या

खुद को खुद ही सजा सुनाने लगे


खुश रहो तुम सदा मेरे हमदम

हम तो दुनिया ही छोड़ जाने लगे


स्वार्थ में अंधे हो गए है सब

ख़ून अपनों का ही बहाने लगे


मौत बिन मौत दे रहे है सब

एक दूजे को फिर जलाने लगे


क्यों क़फ़स में रखे हैं अब मुजरिम

जब जहां को कफ़स बनाने लगे


कर "कमल" कोशिशें जरा कुछ तो

गीत फिर प्यार के वो गाने लगे।


Rate this content
Log in