एक पर्वत
एक पर्वत
एक पर्वत इतना ऊंचा हो गया कि
उसके सामने आसमां झुक गया था
नदियां, झरने, इत्यादि सब उसके हो गए
जो बादल कल तक हँस रहा था उस पर
वह उसका ही अब सेवक हो गया
एक समय वह पत्थरों का बिखरा झुंड था
कई लोग उसका उपहास उड़ाते रहते थे
लेकिन, जैसे ही सभी झुंड संगठित हुए
अथक प्रयास निरंतर करते रहे, मिलते रहे
एक दूसरे से जुड़ते गए, बढ़ते गए...
और ऐसे ही बढ़ते बढ़ते वे सब
विशाल पर्वत हो गए
अब कोई इसे जबरन का तुगलक
फरमान नहीं सुनाता
इस पर्वत का हिस्सा कोई
तथाकथित बुद्धिजीवी नहीं हैं
इस पर्वत का हिस्सा बस
लोकतंत्र के सच्चे सिपाही हैं
जिन्होंने हर एक पल अपने
राष्ट्र को खून पसीने से सींचा
