STORYMIRROR

निखिल कुमार अंजान

Others

2  

निखिल कुमार अंजान

Others

धन की लगन

धन की लगन

1 min
161

धन की ऐसी लगी लगन

सुध बुध खोई अपनी जो

तो ध्यान न रहा तन बदन

माया में है काया खोई

सुबह शाम बस माला जपता

धन के लालच में मोही

कर्म भी भूला धर्म भी भूला

माया की है अजब ये लीला

गरीब मजबूरों का पैसा खाया

फिर भी धन की लालसा से

तेरा पीछा छूट न पाया

पैसों की तू गठरी बांधे किंतु

कपड़ो से अपने तन को न ढांके

भूख प्यास तेरी सब उड़ जाए

तिजोरी से जब तेरी पैसा जाए

माया से तूने ऐसी प्रीत लगाई

रिश्ते नातों मे कडवाहट आई

बेशक तूने सम्पत्ति बनाई

अंत समय मे तेरे, ओ बंधु मात्र

दो गज जमीन ही काम आई


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन