चुलबुली सखी
चुलबुली सखी
बात उन दिनो की है, ना बचपन ना जवानी की है,
ना कालिज, ना स्कूल बड़े की, क्लास तीसरी की है,
एक नई मेरी सहेली बनी थी, बड़ी वो चुलबुली थी,
बस बातें ही बातें कोरी थी, नाम की ना पढ़ाई थी,
जब बीत गया फुल मस्ती में साल सारा,
इतने में फाइनल एग्जाम ने डाला डेरा,
पढ़ा तो कुछ था नहीं, सोच कर चिंता जगी,
तब धड़ाधड़ दिन - रात किताबों में सिर खपाने लगी,
दो दिन फाइनल एग्जाम को रह गए थे,
चिंता और परेशानी से मेरे हाल बुरे थे,
रात भर ना सोती थी, ट्यूशन भी मैं पढ़ती थी,
दिन में जब जाती स्कूल क्लास में झपकी लगती थी,
एक दिन लग गई आंख मेरी, सामने देखा मैडम खड़ी,
पर्चे वो बांट रही थी, पीछे उसके काली डायन खड़ी थी,
बादल रूपी डायन से डरकर भागी मैं पांव सर पर रखकर,
उपर जो मैंने की निगाह, सुन्दर चांद सी चमकती परी को देखा,
दिमाग के डर के डायन रूपी काले बाल को झटका दूर,
दिल रूपी सुंदर चांद सी परी को मैंने गले लगाया हज़ूर,
दिमाग में जो डर था एग्जाम का, दिल ने उसे दिया भगा,
करके मेहनत जब उत्तीर्ण हुई,
आलस रूपी चुलबुली सखी को कभी ना मिलने की कसम खाई।
तो बच्चो, ऐसी चुलबुली सखी से दूर अगर रहोगे,
दिमाग का डर रूपी काले बादल वाली डायन से भी बचे रहोगे।
