बसंत
बसंत
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उसकी दुधिया हँसी
और फेनिल बातों में
छिपी है बसंत की
मीठी गुनगुनाहट,
उसकी प्यारी गदबदी
उपस्थिति ने रंग डाले
लाल सारे पलाश,
पहना दिए विटपों को
झबले फूलों के,
उसकी कोमल हथेलियों में
बसंत ने रचा भविष्य,
पतझड़ की छाती पर
रखकर पैर
कभी चुपके से
कभी खुलकर
उसके आँगन में
उतर आता है,
अनगिन बसंत
खोल डालता है
अपने सारे राज
राग और विराग,
बासंती हवा जब - जब
कर डालती है
उसके कपोलों को
लाल गुलनार,
तब-तब मौसम की
इस मेहरबानी का
कायल होना ही पड़ता है
मुझे, हमें, तुम्हें, उन्हें।
