बरखा
बरखा
1 min
290
देखो तो बादल कुछ कह रहे है
भर गए है गले तक अब बह रहे है
कोई इस आहत से मुग्ध है
कोई सहमा सा है
किसी की मुस्कान लौट आई है
किसी को ये बहुत रुलाई है
किसी के घर कड़ाई चढ़ी है
किसी की रूह कांपी पड़ी है
वो आज कहाँ सिर छुपायेंगे
जब तुम्हारे अरमान बारिश से मचल जायँगे
जब वो बादल ही ये बूंदें न संजो पाया
तो तुम क्या पा जाओगे
इतना दर्द लेके कहाँ जाओगे
की कह दो अपने अरमानो से
ज्यादा न बहको
वो गरीब भी तो बैठा हैं
उसके मन की तरह महको
ओ बरखा तू जरा थम के बरस
कहीं वो मानव अन्न को जाए न तरस
तेरा आना तय है
पर किसी को इसी बात का भय है
तू आ पर खुशहाली ला
ज्यादा न बरस अब जा
