बोनसाई
बोनसाई
1 min
181
बोनसाई नहीं है ज़िंदगी
ना ही जीवन का नाम
पतझड़ है
सूखी पत्तियों पर बिछा
वह तो एक
निर्बाध बहती
हर पल नदी है
शैल की ऊँचाई
रत्नाकर की गहराई है
बोनसाई कहाँ है ज़िंदगी
केवल घर की
चारदीवारी में कैद
मेहमान कक्ष में सज
अतिथि को आकर्षित करना
स्त्री का प्रारब्ध नहीं
वह बहती रहे
सदा छल-छल
कल-कल
बढ़ती रहे आगे ही आगे
इसी में है छुपी
उसके जीवन की सार्थकता
नहीं!
केवल बोनसाई
नहीं है उसकी ज़िंदगी!
