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Shoumeet Saha

Others


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Shoumeet Saha

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बहते हुए दर्द

बहते हुए दर्द

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हज़ारों पन्नों में लिख रहे है 

हम अपनी दास्तान ,

न जाने और कितने 

पन्नों में लिखने होंगे,


लफ्ज़ है लाखों में

ज़रूर लेकिन 

न जाने बयान

करने में इन्हे 

और कितने ज़ख्म 

फिर से सहने होंगे ,


हर ज़ख्म की 

एक दास्तान है इन में 

जो भुलाये भी न

भुला सके,


स्याही है तो महज़ एक 

ज़रिया लिखने का

कलम से,

फिर क्यों लगे जैसे

बह रहे हो 

दर्द-ए-लफ्ज़ इनसे?



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