STORYMIRROR

Akshat Shahi

Others

3  

Akshat Shahi

Others

बेक़रारी

बेक़रारी

1 min
323

अब आइना भी कपटी सा हुआ है जाता 

हर दफ़ा कोई अलग चेहरा नज़र है आता 


वो तकलीफ़ देंगे ऐसा मुमकिन नहीं दिखता 

लार्जिश तो है लहजे में पर वादा नहीं आता 



बेवजह उम्मीद रखने का फ़ाएदा नहीं लगता 

खुदा का काम भी अब अदालत में नहीं बनता 



मुश्किल है इन्साफ़-ए-मुंसिफ़ दिल है जानता 

कितना है मुश्किल मुन्तज़िर आँखो को पता 



पढ ली हैं कुछ किताबें काफ़ी कुछ है जानता

बेक़रारी को अब बेकारी का सबब है बताता 


Rate this content
Log in