बदलते रिश्ते
बदलते रिश्ते
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क्यूँ
बदल जाते हैं
बातों के अंदाज़
अपनों के
जब
तक़दीर के घरौंदे
उजड़ते है...
क्यूँ
नहीं समझते की
उनके तानों से...
हमारे दर्द भी
तहों में रिसते है
तक़दीर का क्या
आज नहीं तो
कल संवर जाएगी....
पलट कर गर वार हो
हमारी तरफ़ से
तो सोचो
तुम्हारी हैसियत क्या रह जाएगी ...
क्यूँ
बदल जाते है
लहज़े अपनों के
जब
क़िस्मत के जेब
उधड़ते हैं ..
