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लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

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लाल देवेन्द्र कुमार श्रीवास्तव

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बचपन की यादें

बचपन की यादें

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बचपन के मधुर स्मृतियों का,

एक एक पृष्ठ सजा रखा हूँ।

जिसमें प्यारी, सुंदर माँ का मैंने,

सबसे पहले नाम लिखा हूँ।।


बापू की यादें तो अब तक,

कभी न विस्मृत हो पाई हैं।

बापू ने ही सच पर चलने को,

जीवन में राह दिखलाई है।।


दादा-दादी के संग घूमे-टहले,

याद आता उनका प्यार-दुलार।

दोस्तों के संग मस्ती करते जो

अब जीवन में न आए वो बहार।।


गिल्ली-डंडा व कंचे का खेल,

दोस्तों संग हमने खेला है।

छुपम-छुपाई, कुश्ती व कबड्डी,

दोस्तों संग देखा मेला है।।


खेलों के साथ पढ़ाई पर भी,

हमने ख़ूब ध्यान लगाया।

मात-पिता व गुरुजनों का कर्ज़,

मेरा जीवन योग्य बनाया।।


बचपन की वो मधुर स्मृतियाँ,

अब लौट के न हैं आने वाले।

यादों के वो सुनहरे पल,

जीवन भर न हैं मिटने वाले।।


गाँव के खेतों-मेड़ों संग जाना,

असंख्य चीजें याद आती हैं।

काश! वो बचपन वापस आए,

जो अक्सर हमें रूलाती हैं।।


फिर से लौट आ जाए बचपन,

माँ के गोदी में खेलूँ सो जाऊँ।

बापू की पढ़ने की डांट सुनूँ मैं,

फिर एक नया बचपन मैं पाऊँ।।


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