बचपन के खेल
बचपन के खेल
अजब-गजब बचपन के खेल
छुक-छुक करती आए रेल
कभी चोर-पुलिस की रेलमपेल
कभी दूल्हा-दुल्हन का हो मेल
कभी पिट्ठू बनाने में जुटे हुए
कभी मम्मी से बेहद कुटे हुए
कभी दीवार पर अक्षर सटे हुए
कभी टीचर बन कर डटे हुए...
कभी किचन में खाना बनाएं
कभी बीमारी का बहाना बनाएं
कभी दादी मां की नकल उतारें
कभी राशन लेने लगी कतारें...
कभी डॉक्टर बन इलाज करें
कभी डाकिया बन हम काज करे
कभी कंचों संग खूब दुलार करें
कभी क्रिकेट, वालीबॉल से प्यार करें
कभी गिल्ली डंडा खेलते हम
कभी मुर्गी का अंडा खोजते हम
कभी पतंगबाजी में मशगूल हो जाते
कभी हम शतरंज में खो जाते.........
कभी जज बनकर ऑर्डर करते
कभी पूरा मुंह पाउडर से भरते
कभी मम्मी बनकर डांट सुनाते
कभी पापा बनकर ऑफिस जाते
कभी लकड़ी की काठी गाते
कभी देह पर माटी लगाते
कभी सैनिक बनकर कौम बचाते
कभी शक्तिमान बन रौब दिखाते
कभी फेरीवाले का भेष बनाते
कभी मेला-सा परिवेश सजाते
कभी साइकिल पहिए के पीछे भागते
कभी दमकल वाहन की आवाज़ निकालते
कभी चौकीदार बन सीटी बजाते
कभी मैकेनिक बन पुर्जे लगाते
कभी डांसर बन नाच नाचते
कभी सिंगर बन तराने गाते...
कभी लूडो का पासा घुमाते
कभी कैरम के बादशाह बन जाते
कभी वीडियो गेम में ध्यान लगाते
कभी पुरानी चीज़ों से सामान बनाते
बहुत ही सुंदर, बहुत ही बढ़िया
मनोरंजक खेल थे, हमारे बचपन में
चहकते रहते थे, हम दिन भर और आज भी
इन्हें याद कर, मुस्कुराते हैं हम दर्पण में........
