बैरी बदरा
बैरी बदरा
1 min
352
बैरी बदरा देख यौवन को
बेताब हुआ है भिगाने को
अकेली देख रास्तों पर
तड़प पड़ा है पाने को
बरस रहा है यौवन भी
बरसने लगा है अब बादल भी
खुद को उनसे बचाने को
सर पर दुपट्टा रखें,
भाग रही है यौवन भी
दौड़ पड़ी वट के आगोश में
अपना सर छिपाने को
निचोड़ रही दुपट्टे को
बैरी बूंद गिराने को
थी मदहोश हवायें भी
उड़ा रही थी बालों को
थी होठों पर मुस्कान उसके
झुकी हुई थी नज़रे
बैरी ख्यालों में डूबे
वह खुद को ही संभाल रही..
