अपनी-अपनी मस्ती.....
अपनी-अपनी मस्ती.....
बन्द लिफ़ाफ़े को अक्सर
हम भूत समझ लेते है
अंदर-बाहर क्या होगा
यह स्वरूप समझ लेते है
जो असली है
वो है नकली
जो नकली है
वो है असली
जो बात समझनी होती है
उसे बखूब समझ लेते है
अंधों का शहर है साहिब!
क्यों आईना बेचने निकले हो
गंजों के शहर में क्यों आख़िर
तुम कंघी बेचने निकले हो
माना कि बाज़ार है दुनियाँ
लेकिन कहाँ सब पत्थर है
कुछ दिल भी तो
यहाँ धड़कते है सीने में
आप क्यों कहते उन्हें पत्थर है
पत्थर दिल को दुनियाँ में
लोग खुद ब खुद ख़ुदा समझ लेते है
तुम लुटते हो वो लूटते है
कोई चोर बनकर कोई बनकर डाकू
डर तो साहिब उनसे लगता है
जो अपना बनकर लूटते है
टूट कर बिखरने को जाने
कितने जवां कंवल दिल घूमते है
तुम पत्थरों को ही चूमते हो
हम तुम्हारे क़दमों के निशाँ चूमते है
तुम बनकर मुफ़लिस दौलत के
हम बनकर अमीर इस दिल के
दोनों एक दूसरे से अलहदा
अपनी - अपनी मस्ती में झूमते है...
