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SHALINI SINGH

Others

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SHALINI SINGH

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अनजान हमसफ़र

अनजान हमसफ़र

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हर सोच का व्यापार ,हर नफरत का किरदार,

क्युँ खुद ही में तुम तलाशते फिरती हो?


अनजान हमसफ़र हो तुम खुद सफर पर,

किस गली मुड़, किसका पता पूछती हो ?


नहीं बन सकता हर शख्श तुम्हारा ख़ुदा,

क्युँ बेवज़ह रब की रुबाई तरासती फिरती हो?


यूँ फ़िज़ूल की बातों पर गौर न दिया करो,

शायरों के घर नहीं होते, साहिबा, 

क्यों ख्वाहिशों के आशियाने में बसर करती हो? 



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