अनजान हमसफ़र
अनजान हमसफ़र
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हर सोच का व्यापार ,हर नफरत का किरदार,
क्युँ खुद ही में तुम तलाशते फिरती हो?
अनजान हमसफ़र हो तुम खुद सफर पर,
किस गली मुड़, किसका पता पूछती हो ?
नहीं बन सकता हर शख्श तुम्हारा ख़ुदा,
क्युँ बेवज़ह रब की रुबाई तरासती फिरती हो?
यूँ फ़िज़ूल की बातों पर गौर न दिया करो,
शायरों के घर नहीं होते, साहिबा,
क्यों ख्वाहिशों के आशियाने में बसर करती हो?
